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Hisar e Ana chapter 11 part 1: The Siege of Ego by Elif Rose

Hisar e Ana chapter 11

Hisar e Ana chapter 11

सिकंदर शाह को इस दुनिया से गए एक हफ्ता हो रहा था।
महक के ननिहाल वाले चाहते थे कि इन लोग अब टर्की शिफ़्ट हो जाएं, उसी तरह ददिहाल वाले इंडिया शिफ्ट होने पर मजबूर कर रहे थे। लेकिन इसरा(महक की मां) ने कहीं भी जाने से इनकार कर दिया।
यहां इस घर में उनके महबूब शौहर(पति) की यादें बसीं थीं।
वह कैसे सब छोड़ कर चली जाएं? बच्चों ने भी इस फैसले में उनका साथ दिया था।
लिहाज़ा सारे रिश्तेदार धीरे-धीरे चले गए।
अब बचे थे इस घर के मकीन(निवासी) और यहां जगह जगह बस्ती सिकंदर शाह की यादें।
हालांकि इन दिनों में अमजद अंकल(सिकंदर के ख़ास दोस्त) और अली यहां रोज़ आते थे कि कुछ तो उन लोग का दुख हल्का हो लेकिन भला इतनी जल्दी कभी कोई ज़ख्म भरता है?

रात का वक़्त था।
महक अपने कमरे में बेड पर बैठी थी।
हाथों में वही नोट बुक थी जिसमें वह कुछ दिन पहले पार्टी के लिए लिस्ट तैयार कर रही थी।
इंसान मुस्तकबिल की तैयारियों में लगा रहता है और वक़्त के एक वार से ही सारी तैयारी धरी रह जाती है।
कपकपाते हाथ से उसने पन्ने पर हाथ फेरा। फिर तकलीफ़ से आंखें बंद कर लीं।
यादों के पर्दे पर 5 साल पहले का एक मंज़र उभरने लगा था।

नीले रंग की कॉकटेल पैंट के साथ लाल गिप्सी टॉप पहने शहद रंग बाल पोनी में बांधे 19 साल की महक मुंह फुलाए लिविंग रूम में सोफे पर बैठी थी जब गुस्से में भरा डेनिज़ पापा(सिकंदर) को साथ लिए वहां आया था।
वह और महक शतरंज खेल रहे थे और ख़ुद को हारते देख महक पूरा बोर्ड उलट कर यहां आ बैठी थी।
“Look at her Papa! कैसे मैदान छोड़ कर भागी हैं आपी। सारा गेम ख़राब कर दिया।”
सिकन्दर ने बेटी को नाराज़गी से देखा, “क्या सुन रहा हूं यह? मैं तो तुम्हें अपना शेर बच्चा समझता था।”
महक ने बेचैनी से सर उठाया।
“पापा मुझसे यह मुश्किल से गेम नहीं होते। हार जाती हूं मैं।” उसका अंदाज़ मायूसी लिए हुए था।
सिकंदर मुस्कुराते हुए उसके बग़ल में बैठे।
“तुम्हें हारने से डर लगता है?”
उनके सवाल पर महक ने हां में सर हिलाया।

सिकंदर ने एक गहरी सांस ली।
“जानती हो ज़िन्दगी कितनी मुश्किल होती है? कितने ट्विस्ट एंड टर्न्स आते हैं? अगर तुम इन गेम्स से ही डर कर हिम्मत हार जाओगी तो ज़िन्दगी की बड़ी बड़ी आज़माइशों पर क्या करोगी?”
“लेकिन पापा, मेरी लाइफ तो बहुत मज़े की है। कोई टेंशन, कोई परेशानी नहीं।” वह बेफिक्र थी।
सिकंदर ने बेटी के सर पर हल्की सी चपत लगाई।
“वक़्त हमेशा एक सा नहीं रहता। ख़ुद को मज़बूत बनाओ, इतना मज़बूत कि आगे ज़िन्दगी में जितने भी दुख और मुसीबत आए, तुम उनका डट कर सामना कर सको।” उनकी बात पर वह सोच में पड़ गई।

“आपी की समझ में कुछ नहीं आएगा पापा।” सिंगल सोफे पर बैठे डेनिज़ की ज़ुबान में खुजली हुई।
उसका गुस्सा अभी कम नहीं हुआ था।
महक ने उसे घूरा।
“पापा सबसे पहले तो इसकी पिटाई करिए, इतनी बड़ी हूं इससे, फिर भी मेरी इज्ज़त नहीं करता।”
“पिटाई बाद में होगी। चलो पहले तुम दोनों मेरे सामने शतरंज खेलो और महक, खबरदार जो इस बार ख़ेल बीच में छोड़ा।” उन्होंने वार्न किया।
महक की जगह डेनिज़ या एलिज़ा होती तो उन्हें भी वह इसी तरह मोटिवेट करते।
वह अपने तीनों बच्चों को बहुत मज़बूत देखना चाहते थे।

और फ़िर उस दिन शतरंज कई बार खेला गया।
सिकंदर के साथ इसरा और एलिज़ा भी सामईन(दर्शक) बने हुए थे।
डेनिज़ एक ज़हीन(बुद्धिमान) बच्चा था। वह बार बार जीत रहा था।
मुंह बिसूरती महक ने कई बार खेल छोड़ना चाहा लेकिन पापा की वजह से ऐसा नहीं कर सकी।
और फिर आख़िरकार 5वीं बाज़ी पर वह जीत ही गई। ख़ुशी का तो जैसे कोई ठिकाना ही न था।
पूरे घर में शोर मचा दिया था उसने।
“पापा अब तो मैं सच में आपका शेर बच्चा हूं ना?” आंखों में चमक लिए उसने बाप से पूछा।
सिकंदर शाह ने फख्र से मुस्कुराते हुए उसके सर पर हाथ फेरा।
“हां पापा की जान।”

यादों की डायरी का यह पन्ना बहुत ख़ूबसूरत था।
उसकी बंद आंखों के किनारे से आंसु तेज़ी से बहने लगे।
“आपका शेर बच्चा फिर कमज़ोर पड़ रहा है पापा।” लरज़ती आवाज़ में बोलती आज अकेले में वह जैसे टूट कर बिखरी थी। घुटनों में सर दिए हिचकियों से रो दी थी।


to be continued…….

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